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Satyanarayan Vrat Katha: श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा संपूर्ण हिंदी में

श्री सत्यनारायण व्रत कथा: एक विस्तृत मार्गदर्शन

 

परिचय:- श्री सत्यनारायण व्रत कथा (Satyanarayan Vrat Katha) हिंदू धर्म में एक अत्यधिक पूजनीय और लोकप्रिय धार्मिक अनुष्ठान है। यह व्रत विशेषकर पूर्णिमा के दिन किया जाता है, लेकिन इसे किसी भी शुभ दिन, जैसे कि एकादशी या संक्रांति पर भी किया जा सकता है। इस व्रत का उद्देश्य भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की आराधना करके जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त करना है। इस लेख में हम श्री सत्यनारायण व्रत कथा के इतिहास, महत्व, विधि, और कथा के विभिन्न प्रसंगों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय

एक समय की बात है नैषिरण्य तीर्थ में शौनिकादि, 88,000 ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा हे प्रभु! इस कलियुग में वेद विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिल सकती है? तथा उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनि श्रेष्ठ ! कोई ऐसा तप बताइए जिससे थोड़े समय में ही पुण्य मिलें और मनवांछित फल भी मिल जाए।

इस प्रकार की कथा सुनने की हम इच्छा रखते हैं। सर्व शास्त्रों के ज्ञाता सूतजी बोले: हे वैष्णवों में पूज्य ! आप सभी ने प्राणियों के हित की बात पूछी है इसलिए मैं एक ऐसे श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों को बताऊंगा जिसे नारद जी ने लक्ष्मीनारायण जी से पूछा था और लक्ष्मीपति ने मनिश्रेष्ठ नारद जी से कहा था। आप सब इसे ध्यान से सुनिए |

एक समय की बात है, योगीराज नारदजी दूसरों के हित की इच्छा लिए अनेकों लोको में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे। यहां उन्होंने अनेक योनियों में जन्मे प्राय: सभी मनुष्यों को अपने कर्मों द्वारा अनेकों दुखों से पीड़ित देखा। उनका दुख देख नारदजी सोचने लगे कि कैसा यत्न किया जाए जिसके करने से निश्चित रुप से मानव के दुखों का अंत हो जाए। इसी विचार पर मनन करते हुए वह विष्णुलोक में गए। वहाँ वह देवों के ईश नारायण की स्तुति करने लगे जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे, गले में वरमाला पहने हुए थे।

स्तुति करते हुए नारद जी बोले, हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती हैं। आपका आदि, मध्य तथा अंत नहीं है। निर्गुण स्वरुप सृष्टि के कारण भक्तों के दुख को दूर करने वाले है, आपको मेरा नमस्कार है। नारदजी की स्तुति सुन विष्णु भगवान बोले, हे मुनिश्रेष्ठ! आपके मन में क्या बात है? आप किस काम के लिए पधारे हैं? उसे नि:संकोच कहो।

इस पर नारद मुनि बोले कि मृत्युलोक में अनेक योनियों में जन्मे मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अनेको दुख से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि वो मनुष्य थोड़े प्रयास से ही अपने दुखों से कैसे छुटकारा पा सकते है।

श्रीहरि बोले, हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह बात मैं कहता हूं, उसे सुनो। स्वर्ग लोक व मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है जो पुण्य देने वाला है। आज प्रेमवश होकर मैं उसे तुमसे कहता हूं। श्रीसत्यनारायण भगवान का यह व्रत अच्छी तरह विधानपूर्वक करके मनुष्य तुरंत ही यहाँ सुख भोग कर, मरने पर मोक्ष पाता है।

श्रीहरि के वचन सुन नारदजी बोले कि उस व्रत का फल क्या है? और उसका विधान क्या है? यह व्रत किसने किया था? इस व्रत को किस दिन करना चाहिए? सभी कुछ विस्तार से बताएं। नारद की बात सुनकर श्रीहरि बोले, दुख व शोक को दूर करने वाला यह सभी स्थानों पर विजय दिलाने वाला है। मानव को भक्ति व श्रद्धा के साथ शाम को श्रीसत्यनारायण की पूजा धर्म परायण होकर ब्राह्मणों व बंधुओं के साथ करनी चाहिए। भक्ति भाव से ही नैवेद्य, केले का फल, घी, दूध और गेहूँ का आटा सवाया लें। गेहूं के स्थान पर साठी का आटा, शक्कर तथा गुड़ लेकर व सभी भक्षण योग्य पदार्थो को मिलाकर भगवान का भोग लगाएँ।

ब्राह्मणों सहित बंधु-बांधवों को भी भोजन कराएं, उसके बाद स्वयं भोजन करें। भजन, कीर्तन के साथ भगवान की भक्ति में लीन हो जाएं। इस तरह से सत्य नारायण भगवान का यह व्रत करने पर मनुष्य की सारी इच्छाएँ निश्चित रुप से पूरी होती हैं। इस कलि काल अर्थात कलियुग में मृत्युलोक में मोक्ष का यही एक सरल उपाय बताया गया है।

॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।|

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सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का दूसरा अध्याय
सूत जी बोले, हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत (Satyanarayan Vrat Katha) को किया था उसका इतिहास कहता हूं, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था।

ब्राह्मणों से प्रेम से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास जाकर पूछा: हे विप्र! नित्य दुखी होकर तुम पृथ्वी पर क्यूों घूमते हो? दीन ब्राह्मण बोला, मैं निर्धन ब्राह्मण हूं। भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूं। हे भगवान! यदि आप इसका कोई उपाय जानते हो तो बताइए। वृद्ध ब्राह्मण कहता है कि सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं इसलिए तुम उनका पूजन करो। इसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए सत्यनारायण भगवान उस निर्धन ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर अन्तर्धान हो गए। ब्राह्मण मन ही मन सोचने लगा कि जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण करने को कह गया है मैं उसे जरुर करूंगा। यह निश्चय करने के बाद उसे रात में नींद नहीं आई। वह सवेरे उठकर सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिए चला गया। उस दिन निर्धन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत धन मिला। जिससे उसने बंधु-बांधवों के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत संपन्न किया। भगवान सत्यनारायण का व्रत संपन्न करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी दुखों से छूट गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हो गया।

उसी समय से यह ब्राह्मण हर माह इस व्रत को करने लगा। इस तरह से सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो मनुष्य करेगा वह सभी प्रकार के पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। जो मनुष्य इस व्रत को करेगा वह भी सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा।

सूतजी बोले कि इस तरह से नारद जी से नारायण जी का कहा हुआ श्रीसत्यनारायण व्रत को मैने तुमसे कहा। हे विप्रो ! मैं अब और क्या कहूँ? ऋषि बोले, हे मुनिवर ! संसार में उस विप्र से सुनकर और किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब इस बात को सुनना चाहते हैं। इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा का भाव है।

सूतजी बोले, हे मुनियों! जिस-जिस ने इस व्रत को किया है, वे सब सुनो ! एक समय वही विप्र धन व ऐश्वर्य के अनुसार अपने बंधु-बांधवों के साथ इस व्रत को करने को तैयार हुआ। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया और लकड़ियां बाहर रखकर अंदर ब्राह्मण के घर में गया। प्यास से दुखी वह लकड़हारा उनको व्रत करते देख विप्र को नमस्कार कर पूछने लगा कि आप यह क्या कर रहे है तो उन्होंने बताया कि व्रत कर रहा हूं। तथा इसे करने से क्या फल मिलेगा? कृपया मुझे भी बताएं। ब्राह्मण ने कहा कि सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है। इनकी कृपा से ही मेरे घर में धन धान्य आदि की वृद्धि हुई है।

विप्र से सत्यनारायण व्रत या के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। चरणामृत लेकर व प्रसाद खाने के बाद वह अपने घर गया। लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से श्रीसत्यनारायण भगवान का उत्तम व्रत करूंगा। मन में इस विचार को ले बूढ़ा आदमी सिर पर लकड़ियां रख उस नगर में बेचने गया जहां धनी लोग ज्यादा रहते थे। उस नगर में उसे अपनी लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना अधिक मिलता है।

बूढ़ा प्रसन्नता के साथ दाम लेकर केले, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूं का आटा ले और सत्यनारायण भगवान के व्रत की अन्य सामग्रियां लेकर अपने घर गया। वहां उसने अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर विधि विधान से सत्यनारायण भगवान का पूजन और व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन पुत्र आदि से युक्त होकर संसार के समस्त सुख भोग अंत काल में बैकुंठ धाम चला गया।

॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का दूसरा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।

सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का तीसरा अध्याय

सूतजी बोले, हे श्रेष्ठ मुनियों, अब आगे की कथा (Satyanarayan Vrat Katha) कहता हूं। पहले समय में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देव स्थानों पर जाता और निर्धनों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी कमल के समान मुख वाली तथा सती साध्वी थी। भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनो ने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत किया। उसी समय साधु नाम का एक वैश्य आया। उसके पास व्यापार करने के लिए बहुत सा धन भी था। राजा को व्रत करते देखकर वह विनय के साथ पूछने लगा, हे राजन ! भक्तिभाव से पूर्ण होकर आप यह क्या कर रहे हैं? मैं सुनने की इच्छा रखता हूँ तो आप मुझे बताएं।

राजा बोला, हे साधु! अपने बंधु-बांधवों के साथ पुत्रादि की प्राप्ति के लिए एक महाशक्तिमान श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूं। राजा के वचन सुन साधु आदर से बोला, हे राजन! मुझे इस व्रत का सारा विधान कहिए। आपके कथनानुसार मैं भी इस व्रत को करुँगा। मेरी भी संतान नहीं है और इस व्रत को करने से निश्चित रुप से मुझे संतान की प्राप्ति होगी। राजा से व्रत का सारा विधान सुन, व्यापार से निवृत हो वह अपने घर गया।

साधु वैश्य ने अपनी पत्नी को संतान देने वाले इस व्रत का वर्णन कह सुनाया और कहा कि जब मेरी संतान होगी तब मैं इस व्रत को करुंगा। साधु ने इस तरह के वचन अपनी पत्नी लीलावती से कहे। एक दिन लीलावती पति के साथ आनन्दित हो सांसारिक धर्म में प्रवृत होकर सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई। दसवें महीने में उसके गर्भ से एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया। दिनों दिन वह ऐसे बढ़ने लगी जैसे कि शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़ता है। माता-पिता ने अपनी कन्या का नाम कलावती रखा।

एक दिन लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति को याद दिलाया कि आपने सत्यनारायण भगवान के जिस व्रत को करने का संकल्प किया था उसे करने का समय आ गया है, आप इस व्रत को करिये। साधु बोला कि हे प्रिये! इस व्रत को मैं उसके विवाह पर करुँगा। इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन देकर वह नगर को चला गया। कलावती पिता के घर में रह वृद्धि को प्राप्त हो गई।

साधु ने एक बार नगर में अपनी कन्या को सखियों के साथ देखा तो तुरंत ही दूत को बुलाया और कहा कि मेरी कन्या के योग्य वर देख कर आओ। साधु की बात सुनकर दूत कंचन नगर में पहुंचा और वहाँ देखभाल कर लड़की के सुयोग्य वाणिक पुत्र को ले आया। सुयोग्य लड़के को देख साधु ने बंधु-बांधवों को बुलाकर अपनी पुत्री का विवाह कर दिया लेकिन दुर्भाग्य की बात ये कि साधु ने अभी भी श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत नहीं किया।

इस पर श्री भगवान क्रोधित हो गए और श्राप दिया कि साधु को अत्यधिक दुख मिले। अपने कार्य में कुशल साधु बनिया जमाई को लेकर समुद्र के पास स्थित होकर रत्नासारपुर नगर में गया। वहां जाकर दामाद-ससुर दोनों मिलकर चन्द्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से एक चोर राजा का धन चुराकर भाग रहा था। उसने राजा के सिपाहियों को अपना पीछा करते देख चुराया हुआ धन वहां रख दिया जहां साधु अपने जमाई के साथ ठहरा हुआ था। राजा के सिपाहियों ने साधु वैश्य के पास राजा का धन पड़ा देखा तो वह ससुर-जमाई दोनों को बांधकर प्रसन्नता से राजा के पास ले गए और कहा कि उन दोनों चोरों हम पकड़ लाएं हैं, आप आगे की कार्यवाही की आज्ञा दें।

राजा की आज्ञा से उन दोनों को कठिन कारावास में डाल दिया गया और उनका सारा धन भी उनसे छीन लिया गया। श्रीसत्यनारायण भगवान से श्राप से साधु की पत्नी भी बहुत दुखी हुई। घर में जो धन रखा था उसे चोर चुरा ले गए। शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा व भूख प्यास से अति दुखी हो अन्न की चिन्ता में कलावती के ब्राह्मण के घर गई। वहां उसने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा फिर कथा भी सुनी वह प्रसाद ग्रहण कर वह रात को घर वापिस आई। माता के कलावती से पूछा कि हे पुत्री अब तक तुम कहां थी? तेरे मन में क्या है?

कलावती ने अपनी माता से कहा, हे माता ! मैंने एक ब्राह्मण के घर में श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत देखा है। कन्या के वचन सुन लीलावती भगवान के पूजन की तैयारी करने लगी। लीलावती ने परिवार व बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और उनसे वर मांगा कि मेरे पति तथा जमाई शीघ्र घर आ जाएं। साथ ही यह भी प्रार्थना की कि हम सब का अपराध क्षमा करें।

श्रीसत्यनारायण भगवान इस व्रत से संतुष्ट हो गए और राजा चन्द्रकेतु को सपने में दर्शन दे कहा कि: हे राजन! तुम उन दोनो वैश्यों को छोड़ दो और तुमने उनका जो धन लिया है उसे वापस कर दो। अगर ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हारा धन राज्य व संतान सभी को नष्ट कर दूंगा। राजा को यह सब कहकर वह अन्तर्धान हो गए।

प्रात:काल सभा में राजा ने अपना सपना सुनाया फिर बोले कि बणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाओ। दोनो ने आते ही राजा को प्रणाम किया। राजा मीठी वाणी में बोला, हे महानुभावों ! भाग्यवश ऎसा कठिन दुख तुम्हें प्राप्त हुआ है लेकिन अब तुम्हें कोई भय नहीं है। ऎसा कह राजा ने उन दोनों को नए वस्त्राभूषण भी पहनाए और जितना धन उनका लिया था उससे दुगुना धन वापिस कर दिया। दोनो वैश्य अपने घर को चल दिए।

॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का तीसरा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।

सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का चौथा अध्याय

सूतजी बोले, वैश्य ने मंगलाचार कर अपनी यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल दिए। उनके थोड़ी दूर जाने पर एक दण्डी वेशधारी श्रीसत्यनारायण ने उनसे पूछा, हे साधु तेरी नाव में क्या है? अभिवाणी वणिक हंसता हुआ बोला: हे दण्डी ! आप क्यों पूछते हो? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल व पत्ते भरे हुए हैं। वैश्य के कठोर वचन सुन भगवान बोले: तुम्हारा वचन सत्य हो! दण्डी ऐसे वचन कह वहां से दूर चले गए। कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए। दण्डी के जाने के बाद साधु वैश्य ने नित्य क्रिया के पश्चात नाव को ऊंची उठते देखकर अचंभा माना और नाव में बेल-पत्ते आदि देख वह मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ा।

मूर्छा खुलने पर वह अत्यंत शोक में डूब गया तब उसका दामाद बोला कि आप शोक ना मनाएँ, यह दण्डी का शाप है इसलिए हमें उनकी शरण में जाना चाहिए तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी। दामाद की बात सुनकर वह दण्डी के पास पहुंचा और अत्यंत भक्तिभाव नमस्कार कर के बोला, मैंने आपसे जो जो असत्य वचन कहे थे उनके लिए मुझे क्षमा दें, ऐसा कह कहकर महान शोकातुर हो रोने लगा तब दण्डी भगवान बोले, हे वणिक पुत्र ! मेरी आज्ञा से बार-बार तुम्हें दुख प्राप्त हुआ है।

तू मेरी पूजा से विमुख हुआ। साधु बोला, हे भगवान ! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जानते तब मैं अज्ञानी कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइए, अब मैं सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मेरी रक्षा करो और पहले के समान नौका में धन भर दो।

साधु वैश्य के भक्तिपूर्वक वचन सुनकर भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वरदान देकर अन्तर्धान हो गए। ससुर-जमाई जब नाव पर आए तो नाव धन से भरी हुई थी फिर वहीं अपने अन्य साथियों के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपने नगर को चल दिए। जब नगर के नजदीक पहुंचे तो दूत को घर पर खबर करने के लिए भेज दिया। दूत साधु की पत्नी को प्रणाम कर कहता है कि मालिक अपने दामाद सहित नगर के निकट आ गए हैं।

दूत की बात सुन साधु की पत्नी लीलावती ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपनी पुत्री कलावती से कहा कि मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूं तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आ जा! माता के ऎसे वचन सुन कलावती जल्दी में प्रसाद छोड़ अपने पति के पास चली गई। प्रसाद की अवज्ञा के कारण श्रीसत्यनारायण भगवान रुष्ट हो गए और नाव सहित उसके पति को पानी में डुबो दिया। कलावती अपने पति को वहाँ ना पाकर रोती हुई जमीन पर गिर गई।

नौका को डूबा हुआ देख व कन्या को रोता देख साधु दुखी होकर बोला कि हे प्रभु ! मुझसे तथा मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करें।साधु के दीन वचन सुनकर श्रीसत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और आकाशवाणी हुई: हे साधु! तेरी कन्या मेरे प्रसाद को छोड़कर आई है इसलिए उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटती है तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा। ऐसी आकाशवाणी सुन कलावती घर पहुंचकर प्रसाद खाती है और फिर आकर अपने पति के दर्शन करती है। उसके बाद साधु अपने बंधु-बाँधवों सहित श्रीसत्यनारायण भगवान का विधि-विधान से पूजन करता है। इस लोक का सुख भोग वह अंत में स्वर्ग जाता है।

॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चौथा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।

सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का पांचवा अध्याय 

सूतजी बोले, हे ऋषियों ! मैं और भी एक कथा सुनाता हूं, उसे भी ध्यानपूर्वक सुनो! प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भी भगवान का प्रसाद त्याग कर बहुत ही दुख सान किया। एक बार वन में जाकर वन्य पशुओं को मारकर वह बड़ के पेड़ के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से अपने बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा। अभिमानवश राजा ने उन्हें देखकर भी पूजा स्थान में नहीं गया और ना ही उसने भगवान को नमस्कार किया। ग्वालों ने राजा को प्रसाद दिया लेकिन उसने वह प्रसाद नहीं खाया और प्रसाद को वहीं छोड़ वह अपने नगर को चला गया।

जब वह नगर में पहुंचा तो वहाँ सबकुछ तहस-नहस हुआ पाया तो वह शीघ्र ही समझ गया कि यह सब भगवान ने ही किया है। वह दुबारा ग्वालों के पास पहुंचा और विधि पूर्वक पूजा कर के प्रसाद खाया तो श्रीसत्यनारायण भगवान की कृपा से सब कुछ पहले जैसा हो गया। दीर्घकाल तक सुख भोगने के बाद मरणोपरांत उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई।

जो मनुष्य परम दुर्लभ इस व्रत को करेगा तो भगवान सत्यनारायण की अनुकंपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन धनी हो जाता है और भयमुक्त हो जीवन जीता है। संतान हीन मनुष्य को संतान सुख मिलता है और सारे मनोरथ पूर्ण होने पर मानव अंतकाल में बैकुंठधाम को जाता है।

सूतजी बोले, जिन्होंने पहले इस व्रत को किया है अब उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूं। वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष की प्राप्ति की। लकड़हारे ने अगले जन्म में निषाद बनकर मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नाम का राजा दशरथ होकर बैकुंठ को गए। साधु नाम के वैश्य ने मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष पाया। महाराज तुंगध्वज ने स्वयंभू होकर भगवान में भक्तियुक्त हो कर्म कर मोक्ष पाया।

॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पांचवा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।

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सत्यनारायण व्रत का महत्व

श्री सत्यनारायण व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक है। इसे करने से न केवल जीवन में आने वाली समस्याओं का निवारण होता है, बल्कि व्यक्ति को मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल भी प्राप्त होता है। इस व्रत के प्रमुख महत्व निम्नलिखित हैं:

1. सुख-शांति का संचार: सत्यनारायण व्रत करने से परिवार में सुख-शांति का संचार होता है और सभी प्रकार की मानसिक और शारीरिक समस्याओं का निवारण होता है।
2. समृद्धि की प्राप्ति: इस व्रत से घर में समृद्धि आती है और आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है।
3. कष्टों का निवारण: सत्यनारायण व्रत करने से जीवन में आने वाले सभी कष्टों और परेशानियों का निवारण होता है।
4. भविष्य की सुरक्षा: यह व्रत करने से भविष्य में आने वाली कठिनाइयों से बचाव होता है और जीवन में स्थिरता आती है।

 व्रत की तैयारी

श्री सत्यनारायण व्रत करने के लिए पहले से कुछ तैयारियां करनी पड़ती हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि पूजा स्थल शुद्ध और पवित्र हो। यहां कुछ महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं जो व्रत की तैयारी में मदद करेंगे:

1. पूजा सामग्री का संग्रह: श्री सत्यनारायण व्रत के लिए विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है। इसमें मूर्ति या चित्र, कलश, फूल, धूप, दीपक, पंचामृत, फल, नारियल, मिठाई, पान के पत्ते, सुपारी, कलावा, और चंदन शामिल हैं।
2. पूजा स्थल की सफाई: पूजा स्थल को अच्छी तरह से साफ करें और वहां पर रंगोली बनाएं।
3. ध्यान और ध्यान का समय: पूजा के समय का चयन करें और इसे शुभ मुहूर्त में करें। पूर्णिमा का दिन सबसे अधिक शुभ माना जाता है।

सत्यनारायण व्रत कथा की विधि

श्री सत्यनारायण व्रत कथा की विधि में कुछ विशेष चरण होते हैं जिनका पालन करना आवश्यक होता है। इस व्रत को करने के लिए निम्नलिखित विधि का अनुसरण करें:

1. संकल्प और प्रारंभ:- सबसे पहले संकल्प लें कि आप भगवान सत्यनारायण का व्रत कर रहे हैं। इस व्रत को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ करने का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल पर बैठकर ध्यान करें और भगवान सत्यनारायण का ध्यान करें।

2. गणेश पूजा:- पूजा की शुरुआत गणेश पूजा से होती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है, इसलिए किसी भी पूजा या अनुष्ठान की शुरुआत उनसे की जाती है। गणेश जी की मूर्ति या चित्र के सामने धूप, दीपक और फूल अर्पित करें और गणेश मंत्र का जाप करें:

ॐ गं गणपतये नमः

3. कलश स्थापना:- पूजा स्थल पर एक तांबे या मिट्टी का कलश रखें। इसमें जल भरें और उसमें आम के पत्ते और नारियल रखें। कलश पर एक स्वास्तिक का चिह्न बनाएं और उसे पूजा स्थल के बीच में स्थापित करें।

4. नवग्रह और देवताओं की पूजा:- इसके बाद नवग्रहों और अन्य देवी-देवताओं की पूजा करें। इसके लिए विभिन्न मंत्रों का उच्चारण करें और फूल, धूप, और दीपक अर्पित करें।

5. सत्यनारायण भगवान की पूजा:- भगवान सत्यनारायण की मूर्ति या चित्र के सामने धूप, दीपक, फूल, और नैवेद्य अर्पित करें। पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें और चंदन का लेप लगाएं।

6. सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ:- अब सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ करें। यह कथा पाँच अध्यायों में विभाजित होती है, जिनमें भगवान सत्यनारायण की महिमा और उनके भक्तों की कहानियाँ होती हैं।

सत्यनारायण व्रत कथा के पाँच अध्याय – अध्याय 1: साधु और लकड़हारे की कथा

बहुत समय पहले, एक साधु ने वन में भगवान सत्यनारायण की पूजा की। उसी वन में एक लकड़हारा रोज लकड़ी काटने आता था। एक दिन उसने साधु को पूजा करते देखा और उनसे इस पूजा का महत्व पूछा। साधु ने उसे सत्यनारायण व्रत का महत्व बताया। लकड़हारे ने भी भगवान सत्यनारायण की पूजा की और उसकी गरीबी दूर हो गई। उसकी मेहनत रंग लाई और वह धनवान बन गया।

अध्याय 2: वणिक का पुत्र और उनकी स्त्री

एक धनी वणिक अपने पुत्र की शादी एक सुंदर कन्या से कर रहा था। विवाह के बाद वणिक और उसकी पत्नी ने सत्यनारायण व्रत करने का संकल्प लिया। उन्होंने पूजा की और भगवान से सुख और समृद्धि का वरदान मांगा। सत्यनारायण भगवान की कृपा से उनके परिवार में समृद्धि आई और उनका जीवन सुखमय हो गया।

अध्याय 3: राजा उल्कामुख की कथा

राजा उल्कामुख बहुत धार्मिक और न्यायप्रिय राजा थे। एक दिन उन्होंने एक साधु से सत्यनारायण व्रत का महत्व सुना और इसे करने का निर्णय लिया। उन्होंने व्रत किया और उनके राज्य में सुख-शांति और समृद्धि आ गई। उनके सभी कार्य सफल होने लगे और प्रजा भी प्रसन्न रहने लगी।

अध्याय 4: राजा तुंगध्वज की कथा

राजा तुंगध्वज एक पराक्रमी और महान राजा थे। एक दिन उन्होंने सत्यनारायण व्रत करने का संकल्प लिया। व्रत के दौरान उनकी राज्य की सभी समस्याएँ दूर हो गईं और उनके राज्य में खुशहाली आ गई। सत्यनारायण भगवान की कृपा से राजा तुंगध्वज का जीवन सुखमय हो गया।

अध्याय 5: गरीब ब्राह्मण और व्यापारी की कथा

एक गरीब ब्राह्मण और एक व्यापारी ने भगवान सत्यनारायण की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें धन और सुख का वरदान दिया। उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और वे खुशहाल जीवन जीने लगे।

पूजा के बाद के कार्य –  प्रसाद वितरण

पूजा समाप्त होने के बाद भगवान सत्यनारायण का प्रसाद सभी भक्तों में बांटा जाता है। प्रसाद में पंचामृत, फल, मिठाई, और पान के पत्ते शामिल होते हैं। प्रसाद का वितरण करते समय सभी भक्तों को सत्यनारायण व्रत का महत्व और कथा सुनाने की परंपरा होती है।

आशीर्वाद प्राप्त करना:- पूजा समाप्त होने के बाद सभी भक्तों से आशीर्वाद प्राप्त करें। बुजुर्ग और विद्वान व्यक्तियों से आशीर्वाद लें और उनसे अपने परिवार की खुशहाली और समृद्धि की कामना करें।

दान और दक्षिणा:- पूजा के बाद ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान और दक्षिणा दें। यह माना जाता है कि दान करने से भगवान सत्यनारायण की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

सत्यनारायण व्रत कथा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

श्री सत्यनारायण व्रत कथा का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। यह व्रत भारतीय समाज में एकता, सामंजस्य और समर्पण की भावना को बढ़ावा देता है। यह व्रत परिवार और समाज के बीच में आपसी सहयोग और समर्थन की भावना को बढ़ाता है। यहां हम सत्यनारायण व्रत कथा के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के कुछ प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख कर रहे हैं:

पारिवारिक एकता:- सत्यनारायण व्रत के दौरान परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर पूजा करते हैं। इससे परिवार में एकता और सहयोग की भावना बढ़ती है। यह व्रत परिवार के सदस्यों के बीच में आपसी समझ और प्रेम को भी बढ़ावा देता है।

सामुदायिक समर्पण:- यह व्रत अक्सर सामुदायिक स्तर पर भी किया जाता है, जहां कई परिवार मिलकर पूजा करते हैं। इससे सामुदायिक समर्पण और सहयोग की भावना को बढ़ावा मिलता है। यह समाज में एकजुटता और भाईचारे की भावना को प्रबल करता है।

धार्मिक जागरूकता:- सत्यनारायण व्रत कथा के माध्यम से धार्मिक और आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ती है। इस व्रत के दौरान कथा सुनने और समझने से लोगों में धर्म और अध्यात्म के प्रति रुचि और ज्ञान बढ़ता है।

सामाजिक सहायता:- इस व्रत के दौरान दान और दक्षिणा देने की परंपरा है। इससे समाज के जरूरतमंदों को सहायता मिलती है और समाज में सामाजिक न्याय और सहायता की भावना को बढ़ावा मिलता है।

सत्यनारायण व्रत कथा के आध्यात्मिक लाभ

श्री सत्यनारायण व्रत कथा करने से व्यक्ति को अनेक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह व्रत व्यक्ति के मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करता है और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है। यहां हम सत्यनारायण व्रत कथा के आध्यात्मिक लाभों का उल्लेख कर रहे हैं:

मानसिक शांति:- सत्यनारायण व्रत कथा करने से व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त होती है। पूजा के दौरान किए गए ध्यान और मंत्र जाप से मन शांत होता है और व्यक्ति की मानसिक स्थिति में सुधार होता है।

आत्मा की शुद्धि:- यह व्रत व्यक्ति की आत्मा को शुद्ध करता है। भगवान सत्यनारायण की पूजा और कथा सुनने से आत्मा को शांति और सुख का अनुभव होता है। इससे व्यक्ति को आत्मज्ञान प्राप्त होता है और उसकी आत्मा की उन्नति होती है।

आध्यात्मिक उन्नति:- सत्यनारायण व्रत कथा करने से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह व्रत व्यक्ति को भगवान के प्रति समर्पण और भक्ति की भावना को बढ़ाता है। इससे व्यक्ति की आध्यात्मिक जागरूकता और ज्ञान में वृद्धि होती है।

पापों का नाश:- इस व्रत से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है। सत्यनारायण व्रत करने से व्यक्ति के जीवन में किए गए सभी पाप समाप्त हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सत्यनारायण व्रत कथा की लोकप्रियता

श्री सत्यनारायण व्रत कथा की लोकप्रियता भारत और विदेशों में व्यापक रूप से फैली हुई है। इस व्रत की लोकप्रियता के पीछे इसके अद्वितीय लाभ और धार्मिक महत्व हैं। यहां हम सत्यनारायण व्रत कथा की लोकप्रियता के कुछ प्रमुख कारणों का उल्लेख कर रहे हैं:

आसान विधि:- सत्यनारायण व्रत कथा की विधि बहुत आसान होती है। इसे कोई भी व्यक्ति बिना किसी विशेष तैयारी या कठिनाई के कर सकता है। इसकी सरलता के कारण इसे सभी आयु वर्ग के लोग आसानी से कर सकते हैं।

व्यापक स्वीकार्यता:- यह व्रत सभी हिंदू धर्म के अनुयायियों द्वारा व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। इसके धार्मिक महत्व और लाभों के कारण इसे सभी समाजिक वर्गों के लोग मानते हैं।

विशेष अवसरों पर पालन:- सत्यनारायण व्रत कथा विशेष अवसरों जैसे विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण संस्कार, जन्मदिन आदि पर की जाती है। इससे इस व्रत की लोकप्रियता और भी बढ़ जाती है।

आध्यात्मिक संतोष:- इस व्रत को करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक संतोष और सुख प्राप्त होता है। सत्यनारायण व्रत कथा सुनने और करने से व्यक्ति को भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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सत्यनारायण व्रत कथा के वैज्ञानिक दृष्टिकोण

श्री सत्यनारायण व्रत कथा के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के साथ-साथ इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है। यहां हम सत्यनारायण व्रत कथा के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विश्लेषण कर रहे हैं:

मानसिक स्वास्थ्य:- सत्यनारायण व्रत कथा करने से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। पूजा के दौरान किए गए ध्यान और मंत्र जाप से मानसिक तनाव कम होता है और मन शांत होता है। यह व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।

सामाजिक बंधन:- यह व्रत सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है। परिवार और समुदाय के साथ मिलकर पूजा करने से आपसी संबंध मजबूत होते हैं और सामाजिक सहयोग की भावना बढ़ती है।

नियमितता और अनुशासन:- सत्यनारायण व्रत कथा करने से व्यक्ति में नियमितता और अनुशासन की भावना विकसित होती है। यह व्रत व्यक्ति को समय पर पूजा करने और अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।

शारीरिक स्वास्थ्य:- पूजा के दौरान किए गए ध्यान और मंत्र जाप से शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। यह ध्यान और जाप व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं और उसे ऊर्जा प्रदान करते हैं।

श्री सत्यनारायण व्रत कथा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय अनुष्ठान है। यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाने के साथ-साथ उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी प्रेरित करता है। सत्यनारायण व्रत कथा के धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व को समझकर इसे पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ करना चाहिए।

सत्यनारायण व्रत कथा के माध्यम से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी समस्याओं का निवारण होता है। इस व्रत को नियमित रूप से करने से व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। इसलिए, सत्यनारायण व्रत कथा को अपने जीवन का एक अभिन्न अंग बनाएं और भगवान सत्यनारायण की कृपा से अपने जीवन को सुखमय और समृद्ध बनाएं।

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